Friday, December 17, 2004

आतंकवाद से मुख्य धारा की राह

अनुगून्ज तीसरा आयोजनAkshargram Anugunj

आतंकवाद से मुख्य धारा की राह

जब इस मामले पर लिखने का आदेश हुआ, तो रोज सोचा कि कल लिखेंगे... यह सब करते करते आज आखिरी दिन आ गया, पेपर सब्मिट करने का.... और निबन्ध तो बहुत दूर की बात है, विचारों का अब तक तो कुछ भी अता पता नही है. चलो खैर लिखने की कोशिश करते है, आयोजकों से निवेदन है कि मेरे को ज्यादा ना धोयें......

इस विषय पर बात करने से पहले हमे देखना होगा कि आतंकवाद की जड़ें कहाँ पर है, दरअसल आतंकवादी पैदा नही होते, आतंकवादी बनते है परिस्थितयोवश या फिर पैदा किये जाते है किसी उद्देश्य के लिये,धर्म,जाति या समाज के नाम पर.............. यदि किसी क्षेत्र का लगातार शोषण या फिर अवहेलना होती है, तो लोगों मे गुस्सा पैदा होता है, जो धीरे धीरे नफरत और बाद मे विद्रोह का नाम ले लेता है, अक्सर यह विद्रोह हिंसक हो जाता है, जब विद्रोह को कुचलने के लिये सुरक्षाबल लगाये जाते है, जिनकी ज्यादियों के बारे मे लिखने बैठे तो पन्ने भर जायेंगे..........उन ज्यादितियों की वजह से ही हिंसक आन्दोलन, आतंकवाद का रूप ले लेता है...... इसके अलावा कभी कभी शासन समर्थित आतंकवाद भी होता है, जो स्वार्थी राजनेताओ के दिमाग की उपज होता है और किसी ना किसी दिन हाथ से ही निकल जाता है.और देश और दुनिया को खतरे मे डाल देता है.अगर कश्मीर का आतंकवाद देखा जाये तो यह उपेक्षा का ही नतीजा है और कुछ गलतिया हमारे पूर्वज नेताओ की है, और जो बची खुची कसर थी वो पड़ोसी देश ने पूरी कर दी. आतंकवाद तब तक पनप नही सकता जब तक उसे लोगो का कुछ साथ ना हो... लाख पड़ोसी देश चाहे.... जितने आतंकवादी भेजे, जब तक लोकल सपोर्ट नही होगा... ये पनप नही पायेंगे... और यदि आप देखेंगे तो पायेंगे कि इन आतंकवादियों को काफी लोकल सपोर्ट मिलता है, लेकिन लगातार होने वाले आतंकवादी कार्यवाहियों से लोग भी ऊब गये है, शायद यह आतंकवाद का आखिरी चरण है....पंजाब मे आतंकवाद ना सरकार ने रोका, ना सुरक्षाबलो ने,बल्कि इसका श्रेय जाता है पंजाब की जनता को जो इस आतंकवाद से ऊब गयी थी......... और समझ गयी थी....आतंकवाद का रास्ता सही रास्ता नही है.

अब सवाल उठता है कि आतंकवाद से मुख्य धारा का रास्ता क्या हो?
क्या समर्पण किये हुए आतंकवादियों को राष्ट्र की मुख्यधारा मे लाने के लिये उन्हे सेना अथवा अर्धसैनिक बलों मे लाना चाहिये?

सीधा सीधा जवाब तो है नही...................... इसके पीछे कई तर्क है, सवाल यहाँ अविश्वास का नही है, बल्कि सेना के मनोबल का है.अव्वल तो इससे सेना मे ही कंही ना कंही असंतोष फैलेगा कि उनके साथियों के कातिल उनके ही बीच है, इससे सेना के अनुशासन पर असर पड़ेगा...मेरा ख्याल से इन इख्वानियों को कश्मीर मे ही जनहित के कार्यों मे लगाना ठीक रहेगा.......या फिर इनका प्रयोग आतंकवादियों के खिलाफ किये जाने वाली कार्यवाहियों मे किया जा सकता है लेकिन सिर्फ कुछ हद तक... जानकारी जुटाने मे, अथवा आतंकवादियों के ठिकानो तक पहुँचने मे.

दूसरा रास्ता हो सकता है, कूका परे वाला, यानि कि राजनीति मे लाने का.... लेकिन हमारे घाघ राजनीतिज्ञ जानते है, अगर इनको पनपने दिया गया तो राजनीतिज्ञयो का पत्ता साफ हो जायेगा, या फिर इनको रोजगार ने नये अवसर प्रदान करके कुछ किया जा सकता है, जैसे कश्मीर मे पर्यटन को बढावा देने के लिये किसी को होटल व्यवसाय अथवा ट्रेवल एजेंसी या फिर शिकारा वगैरहा के व्यवसाय मे डाला जा सकता है, या फिर खेती बाड़ी जैसे काम मे.... लेकिन सेना मे अथवा अर्धसैनिको बलों मे लाना एक बहुत बड़ी राजनैतिक भूल होगी...जिसका खामियाजा आने वाली नस्लों को भुगतना पड़ सकता है.वैसे भी सरकार इस तरह के कार्यक्रम चलाती रहती है, लेकिन ये सब खानापूर्ति के लिये ही होते है.यदि सरकार इनका पुनर्वास ठीक तरीके से नही करती, तो कोई बड़ी बात नही है कि ये फिर अपनी पुरानी राह पर लौट जायें.लेकिन सरकार के दोहरे मापदण्ड है, चम्बल के डाकुओ का पुनर्वास तो बड़े ही सही तरीके से किया जाता है, उन्हे जमीन,सुविधाये और सामान्य जीवन जीने की आजादी दी जाती है, लेकिन आतंकवादियों के साथ ऐसा व्यवहार नही किया जाता. मेरे हिसाब से समर्पण किये आतंकवादियो के साथ भी कुछ वैसा ही व्यवहार होने चाहिये, ताकि वो भी सामान्य जिन्दगी की तरफ लौट सकें....लेकिन इसका मतलब यह कतई नही है कि उन्हे देश की रखवाली या दूसरे संवेदनशील कामो मे लगाया जाय.... यदि ऐसा होता है तो यह एक बहुत बड़ी राजनैतिक भूल होगी.

इसके अतिरिक्त सरकार को कुछ और कार्यो पर भी ध्यान देना चाहिये... कश्मीर मे मूल भूत ढांचा ठीक करना........रोजगार ने नये अवसर पैदा करना......पर्यटन को बढावा देना.....जनता को सुरक्षा और संरक्षण........शिक्षा..... लोगो के जीवन स्तर और मूलभूत सुविधावो का विकास करना वगैरहा वगैरहा. योजनओ की घोषणाये तो बहुत होती है और कई बार उसके लिये धन भी आवंटित और मुहैया कराया जाता है, लेकिन पैसे नेताओ पर ही खर्च हो जाते है और योजनाये कागजों मे ही दम तोड़ देती है....यदि ऐसा लगातार होता रहा तो सरकार ही जिम्मेदार होंगी...................नये आतंकवादी बनाने मे.


1 comment:

अनूप शुक्ला said...

चलो यह तो तय हुआ कि पूर्व आतंकवादियों को सामरिक महत्व के पद नहीं मिलने चाहिये.अच्छा लिखने के लिये बधाई.